अब सामने लाएँ आईना क्या हम ख़ुद को दिखाएँ आईना क्या ये दिल है इसे तो टूटना था दुनिया से बचाएँ आईना क्या हम अपने आप पर फ़िदा हैं आँखों से हटाएँ आईना क्या इस में जो अक्स है ख़बर है अब देखें दिखाएँ आईना क्या क्या दहर को इज़ने-आगही दें पत्थर को दिखाएँ आईना क्या उस रश्क़े-क़मर से वस्ल रखें पहलू में सुलाएँ आईना क्या हम भी तो मिसाले-आईना हैं अब ‘तूर’ हटाएँ आईना क्या 2. तेरे ही क़दमों में मरना भी अपना जीना भी कि तेरा प्यार है दरिया भी और सफ़ीना भी मेरी नज़र में सभी आदमी बराबर हैं मेरे लिए जो है काशी वही मदीना भी तेरी निगाह को इसकी ख़बर नहीं शायद कि टूट जाता है दिल-सा कोई नगीना भी बस एक दर्द की मंज़िल है और एक मैं हूँ कहूँ कि 'तूर'! भला क्या है मेरा जीना भी. 3. राह-ए-सफ़र से जैसे कोई हमसफ़र गया साया बदन की क़ैद से निकला तो मर गया ताबीर जाने कौन से सपने की सच हुई इक चाँद आज शाम ढले मेरे घर गया थी गर्मी-ए-लहू की उम्मीद ऐसे शख़्स से इक बर्फ़ की जो सिल मेरे पहलू में धर गया है छाप उसके रब्त की हर एक शेर पर वो तो मेरे ख़याल की तह में उतर गया इन्सान बस ये कहिए कि इक ज़िन्दा लाश है हर चीज़ मर गई अगर एहसास मर गया इस ख़्वाहिश-ए-बदन ने न रक्खा कहीं का 'तूर'! इक साया मेरे साथ चला मैं जिधर गया.

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